बॉलीवुड एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय
Aishwarya Rai: बॉलीवुड एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहती हैं. अभिषेक बच्चन से तलाक की अफवाहें भी उड़ती रहती हैं. अब एक्ट्रेस दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गई हैं. उनका आरोप है कि कुछ लोग बिना परमिशन के उनकी फोटो का बिजनेस के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें AI जनरेटेड फोटो भी शामिल है. उन्होंने कोर्ट से अपील की है कि इस पर तत्काल एक्शन लें.
हाई कोर्ट में मंगलवार 9 सितंबर को अपील की गई. अदालत ने कहा कि हम वह एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन की समस्या के समाधान के लिए एक आदेश पारित करेगा, जिससे किसी भी संस्था को उनके नाम, चेहरे, आवाज आदि का बिना अनुमति इस्तेमाल करने से रोका जा सकेगा. मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 को होगी.
ऐश्वर्या के वकील संदीप सेठी ने हाई कोर्ट में उनकी ओर से याचिका दायर की. जिसमें बताया गया कि कुछ वेबसाइटें ऐश्वर्या राय की अनुमति के बिना उनका नाम और तस्वीरें बेचने के साथ-साथ AI-जनरेट अश्लील कंटेंट भी अपलोड कर रही हैं. वह ऑफिशियल वेबसाइट होने का झूठा दावा और बिना पूछे मर्चेंडाइज जैसे कप, टी-शर्ट आदि की बिक्री का जिक्र है. यह सभी उनके व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन हैं. इस पर कोर्ट ने कहा, हम इस बारे में एक आदेश जारी करेंगे और उनकी आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने का आदेश भी देंगे.
लाभ के लिए फोटो का इस्तेमाल
मई 2024 में कोर्ट ने जैकी श्रॉफ के नाम और इमेज का बिना अनुमति उपयोग रोकने के आदेश दिए थे. फिर 2023 में अनिल कपूर की 'झकास' डायलॉग समेत उनके नाम और पहचान का व्यवसायिक उपयोग सीमित कर दिया था. इतना ही नहीं नवंबर 2022 में भी अमिताभ बच्चन की पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए भी आदेश दिया गया था.
बिहार की राजनीति में छोटी पार्टियों की अहमियत
बिहार का राजनीति जोड़ घटाव केवल जेडीयू, बीजेपी या आरजेडी तक सीमित नहीं है. यहां छोटी लेकिन जातिगत और क्षेत्रीय आधार वाली पार्टियां भी बड़े दलों के लिए ‘किंगमेकर’ साबित होती रहती हैं. ये पार्टियां सीमित सीटों पर लड़कर भी सत्ता के समीकरण में अपनी हिस्सेदारी पक्की करती हैं. कहने का मतलब है कि बिहार की राजनीति में जहां बड़े दल सत्ता की कमान थामते हैं, वहीं छोटी पार्टियां सत्ता समीकरण बदलने में अहम भूमिका निभाती हैं.
छोटी पार्टियां अहम क्यों?
छोटे और गौण राजनीतिक दल प्रतिस्पर्धी और अस्थिर चुनावी लोकतंत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जिसे अक्सर कम आंका जाता है, लेकिन ये दल राजनीतिक बहुलवाद में योगदान करते हैं. प्रतिनिधि लोकतंत्र को गहरा करते हैं. क्षेत्र विशेष के हितों और राष्ट्रीय राजनीति के बीच पुल का काम करते हैं.छोटे दलों का मामूली या सीमांत वोट शेयर वोटों को विभाजित कर बड़े दलों का खेल बिगाड़ते हैं या गठबंधन सहयोगी बनकर सरकार के कामकाज को प्रभावित करते हैं. बिहार का यह पैटर्न यूरोपीय राजनीति की तरह है. वहां पर छोटे दल चुनावी गठबंधनों को आकार देते हैं. बातचीत और आम सहमति बनाने के माध्यम से सियासी सौदेबाजी करते हैं.
जातिगत समीकरण छोटे दलों की ताकत
दरअसल, बिहार में जातीय पहचान राजनीति की नींव है. चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) दलित वोट बैंक पर पकड़ रखती है, तो जीतन राम मांझी की हम पार्टी महादलितों की आवाज मानी जाती है. वहीं, मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी मल्लाह और मछुआरा समुदाय में असर रखती है. जबकि उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी (अब जेडीयू में विलय) ओबीसी कुशवाहा वोट पर मजबूत पकड़ रखती थी.
जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर पहली बार विधानसभा चुनाव में अपना असर छोड़ने के लिए पुरजोर कोशिश में जुटे हैं. विधानसभा उपचुनाव में रामगढ़, इमामगंज और बेलागंज में बड़ी संख्या में जन सुराज पार्टी ने वोट हासिल कर आरजेडी को सकते में डाल दिया. ये तीनों सीटें आरजेडी परंपरागत सीटों की तरह है. विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी 12 से 13 प्रतिशत आबादी के प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं.
देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर
ये पार्टियां अक्सर 3 से 15 सीटें जीतकर भी सत्ता की दिशा तय कर देती हैं. वजह-बड़े दलों के बीच कांटे की टक्कर और इन पार्टियों के वोट बैंक का निर्णायक होना है. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में ही जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी तेजस्वी यादव का साथ दे देते तो नीतीश कुमार सीएम नहीं बन पाते.
गठबंधन राजनीति का केंद्र
बिहार में किसी भी गठबंधन के लिए ये पार्टियां ‘अनिवार्य सहयोगी’ बन चुकी हैं. एनडीए हो या महागठबंधन—दोनों ही पक्ष इन नेताओं को अपने पाले में रखने की कोशिश करते हैं, क्योंकि इनके बिना कई सीटों पर जीत मुश्किल हो जाती है.सांसद चिराग पासवान को 5.5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, जो एक बड़ा हिस्सा है और पलड़ा पलटने की क्षमता रखता है, जब उनकी पार्टी बिहार में 2020 के चुनावों में आधे से ज्यादा विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था और पार्टी प्रत्याशी को केवल एक सीट पर जीत मिली थी.
उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक मंच ने 2020 का चुनाव असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ गठबंधन में लड़ा था और उन्हें लगभग 1.75 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि सहनी की वीआईपी को 1.5 प्रतिशत और मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले थे. उपेंद्र कुशवाहा कुशवाहा (कोइरी) जाति के बड़े नेता हैं, जो बिहार की 8-9% आबादी है. कुशवाहा समुदाय खासकर पटना, नालंदा, भोजपुर, औरंगाबाद, रोहतास और बक्सर जिलों में प्रभावी है. भाजपा और जेडीयू के बीच उनकी स्थिति 'किंगमेकर' जैसी होती है, क्योंकि कुशवाहा वोट कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
भाकपा (माले) का अविभाजित बिहार के दिनों से ही कई स्थानीय गढ़ रहे हैं. पार्टी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2020 के चुनावों में रहा, जब उसने महागठबंधन के तहत 19 सीटों पर चुनाव लड़ा और 12 सीटें जीतीं. कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा और 19 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को उससे केवल सात सीटें कम मिलीं.
राहुल और तेजस्वी पहुंचे खानकाह रहमानी
बिहार में 'वोटर अधिकार यात्रा' के क्रम में 22 अगस्त को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव मुंगेर में खानकाह रहमानी पहुंचे. दोनों नेताओं ने खानकाह रहमानी में धर्मगुरुओं से मुलाकात की. यह खानकाह साल 1901 में स्थापित हुई थी. खानकाह में शिक्षा के क्षेत्र को लेकर काफी काम किए जा रहे हैं. इसे JEE-NEET जैसे एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए शिक्षा का हब माना जाता है.
मुंगेर के जिस खानकाह रहमानी जाकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने मौलाना से मुलाकात की, उस खानकाह का लंबा इतिहास है. यह खानकाह 1901 में मौलाना मोहम्मद अली मुंगरी ने स्थापित की थी. तब से यह केंद्र सिर्फ सामाजिक सुधार का ही केंद्र नहीं रहा बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों की मदद भी करता रहा. अब यह इंजीनियरों की खान बन गया है.
नेहरू और गांधी यहां पहुंचे थे
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पहले नेता नहीं हैं जो इस खानकाह रहमानी गए हैं. यहां महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, अबुल कलाम आजाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे लीडर्स भी आने के बाद रुके भी हैं. राहुल गांधी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी इस खानकाह का दौरा किया था. इसके अलावा, ऐसे कई नेता हैं जो इस खानकाह में जा चुके हैं.
JEE और NEET की यहां कराई जा रही तैयारी
खानकाह रहमानी में न केवल छात्रों को कुरान पढ़ाया जाता बल्कि दीन और इस्लाम की तालीम दी जा रही है. साइंस, इंग्लिश और गणित भी पढ़ाई जा रही है. छात्रों को JEE और NEET जैसे एंट्रेंस एग्जाम के लिए तैयार किया जा रहा है. यहां पर चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और कंपनी सेक्रेटरी (CS) परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी सुविधा उपलब्ध है. खानकाह में B.Ed कॉलेज भी है, जिसमें महिला छात्रों की संख्या ज्यादा है. साल 2011 के बाद कई नए कोर्सेज भी यहां जोड़े गए.
लालू यादव का है इस केंद्र से बहुत पुराना कनेक्शन
राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव खानकाह रहमानी से बहुत पुराना सियासी कनेक्शन है. बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पिछले साल भी खानकाह रहमानी मुंगेर पहुंचे थे. यहां उन्होंने अमीर-ए-शरीअत हजरत मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी दामत बरकातहुम से मुलाकात की थी. तेजस्वी यादव ने अपने पिता लालू प्रसाद यादव को फोन पर हजरत अमीर-ए-शरीअत से बातचीत भी कराई थी. तेजस्वी यादव ने बताया था कि उनके परिवार का खानकाह रहमानी के बुजुर्गों से हमेशा गहरा संबंध रहा है. उनके पिता का हजरत मौलाना मोहम्मद वली रहमानी साहब से बहुत गहरा रिश्ता था. उनका परिवार हमेशा खानकाह रहमानी में आता रहा है.
क्या है खानकाह रहमानी की अहमियत
मुस्लिम समाज में शिक्षा और धार्मिक मार्गदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र.
- खानकाह रहमानी के पढ़े कई छात्रों ने IIT, NIT और अन्य तकनीकी संस्थानों में नाम कमाया.
- राहुल-तेजस्वी वोट अधिकारी यात्रा के क्रम मुंगेर पहुंचने पर खानकाह के मुस्लिम धर्मगुरुओं से की मुलाकात, इसका बहुत दूर तक जाएगा संदेश.
- चुनावी मौसम में यह दौरा मुस्लिम वोटरों तक सीधा संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है.
- मुंगेर और आसपास के जिलों में इस खानकाह का मुस्लिम समुदाय पर इस केंद्र का व्यापक असर है.
सियासी मायने
- राहुल गांधी और तेजस्वी यादव का यह कदम मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने और NDA से नाराजगी का लाभ उठाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
- खानकाह रहमानी जैसे प्रतिष्ठित केंद्र से जुड़ाव दिखाकर विपक्ष अपने 'इंक्लूसिव पॉलिटिक्स' का संदेश दे रहा है.
- RJD और कांग्रेस गठजोड़ मुस्लिम समाज में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं.
- राहुल गांधी का यह दौरा मुस्लिम समुदाय को यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि कांग्रेस उनके साथ खड़ी है.
नेपाल में क्यों नहीं टिक पाती चुनी हुई सरकार?
नेपाल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनी सरकार अभी तक जनता की अपेक्षा पर खरी नहीं उतर पाई है. खासकर 2008 में राजशाही खत्म होने और गणतंत्र बनने के बाद संसद का विघटन, गठबंधन की राजनीति, बाहरी दबाव, वैचारिक संघर्ष और नेताओं के बीच आपसी टकराव ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को अस्थिर बना दिया. जनता जहां सरकार से विकास और स्थिरता की उम्मीद करती है. इसके उलट लोगों को राजनीतिक खींचतान का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से नेपाल में एक बार फिर सियासी अराजकता का माहौल है.
ऐसे में नेपाल में एक बार फिर बहस तेज हो गई है कि क्या राजशाही की व्यवस्था ही नेपाल के लिए बेहतर थी? सियासी उठापटक से निराश लोगों को अब राजशाही के स्थिर शासन की यादव आने लगी हैं.
नेपाल में क्यों नहीं टिक पाते प्रधानमंत्री?
नेपाल का राजनीतिक इतिहास अस्थिरता से भरा रहा है. लगभग हर साल चुनी हुई सरकारें गिरती रही हैं. इसके पीछे प्रमुख वजह दल-बदल, गठबंधन की राजनीति, आपसी अविश्वास और सत्ता संघर्ष है. जब से नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनाव के जरिए सरकार का गठन होने लगा है, तब से नेपाल में शायद ही कोई पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई है. इससे गठबंधन सरकार बनती है, जो स्थायी नहीं रह पाती. गठबंधन में शामिल दल अपने-अपने सियासी हितों के बीच एक साथ सरकार चलाने को तालमेल नहीं बैठा पाते हैं. इस नतीजा यह होता है कि वहां पर सरकार स्थिर नहीं रह पाती.
सियासी दलों के नेताओं के बीच सत्ता की खींचतान और पद की राजनीति ने स्थिर शासन को असंभव बना दिया है. ऐसा इसलिए कि बड़े नेता खुद की निजी महत्वाकांक्षा से बाहर नहीं निकल पाते हैं.
संविधान की चुनौतियां
सियासी अस्थिरता की वजह से नया संविधान कई बार विवादों में घेरे में आ जाता है, जिससे सत्ता संचालन में टकराव पैदा होता है. जन अपेक्षाओं की अनदेखी, खासकर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विकास योजनाओं में देरी ने लोगों का भरोसा तोड़ा है.
राजशाही व्यवस्था की चर्चा क्यों?
दरअसल, राजशाही के दौर में सरकारें बदलने का संकट कम था, जिससे प्रशासनिक स्थिरता बनी रहती थी. राजा अपने हिसाब से फैसला लेते रहते थे. हालांकि, राजशाही की कमियों की वजह से लोगों को निराशा हाथ लगी. राजशाही में लोकतांत्रिक अधिकार सीमित थे और जनता ने लंबे संघर्ष के बाद लोकतंत्र हासिल किया. लेकिन मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता ने जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या राजशाही में कम से कम स्थिर शासन तो था.
जनता की नजर में समस्या का समाधान क्या?
जेन जैड आंदोलन के बाद नेपाल में चर्चा है कि संविधान और संसद को स्थिरता मिले. राजनीतिक दलों के नेता जवाबदेही के साथ काम करें. दल और नेता केवल सत्ता की राजनीति छोड़कर जनता की समस्याओं पर ध्यान दें. देश के आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करें. रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा को बढ़ा मिले. ऐसा होने पर ही सियासी दलों के नेता जनता को अपने भरोसे में पाएंगे.